Brief Description
च.चि.२३/१०१-१०४, अ.सं.उ.४०/१०४
तरुणपलाशक्षारं स्रुतं पचेच्चूर्णितैः सह समांशैः|
लोहितमृद्रजनीद्वयशुक्लसुरसमञ्जरीमधुकैः||१०१||
लाक्षासैन्धवमांसीहरेणुहिङ्गुद्विसारिवाकुष्ठैः|
सव्योषैर्बाह्लीकैर्दर्वीविलेपनं घट्टयेद्यावत्||१०२||
सर्वविषशोथगुल्मत्वग्दोषार्शोभगन्दरप्लीह्नः|
शोथापस्मारक्रिमिभूतस्वरभेदपाण्डुगदान्||१०३||
मन्दाग्नित्वं कासं सोन्मादं नाशयेयुरथ पुंसाम्|
गुटिकाश्छायाशुष्काः कोलसमास्ताः समुपयुक्ताः||१०४||
इति क्षारागदः|
पलाशक्षारं स्रुतमिति सुश्रुतोक्तक्षारपरिस्रावणविधिना स्रावितम्| लोहितमृत् गैरिकम्| सुरसमञ्जरी [६] पर्णासभेदः||७७-१०४||
तरुणस्य पलाशस्य स्रुतं क्षारोदकं पचेत्|
क्वाथे तत्र प्रतीवापं प्रक्षिपेच्छ्लक्ष्णचूर्णितम्|
व्योषं शिरीषकुसुमं मधुकं सारिवे मिसिम्|
कुष्ठं वेल्लनिशे लाक्षां शुक्लां सुरसमञ्जरीम्|
सिन्धूत्थं रक्तमृन्मांसी रेणुकां हिङ्गुवाह्विकम्|
दर्वीप्रलेपि तज्जातं गोविषाणे निधापयेत्|
क्षयगुल्मोदरार्शांसि मेहं मन्दाग्नितां ज्वरम्|
त्वग्दोषकासापस्मारग्रहोन्मादभगन्दरान्|
पाण्डुं कण्ठस्वरगदान् प्लीहानं श्वयथुं कृमीन्|
कोलमात्रमतः खादन् जयेत् सर्वविषाणि च||८२||
तरुणपलाशस्य क्षारेण स्रुतमुदकं पचेत्| तस्मिन् क्वाथे पच्यमाने व्योषादिकं श्लक्ष्णचूर्णितं प्रतीवापं प्रक्षिपेत्| तच्च पाकेन दर्वीप्रलेपि जातं गोशृङ्गे निधापयेत्| अतः प्रत्यहं कोलमात्रं खादन् क्षयादीनि सर्वविषाणि च जयेत्| शुक्लामिति सुरसमञ्जर्या विशेषणम्| रक्तमृत् गैरिकम्| रेणुका हरेणुः| वाह्लीकं कुङ्कुमम्|| ८२|
| Sl.No | Raw Material | Variant | Ratio | Quantity Required for 1000g | Unit |
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| Rasa | |
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| Guna | |
| Veerya | Ushna veerya |
| Vipaka | Madhura |
| Prabhava | |
| Anupanam | modal-content |
| Sl.No. | Disease Factor | Name of the combination | Form of the combination | Reference | Combination products | Procedure |
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| Disease Factors |
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| Type | Operator | Value | Unit | Frequency | Duration | Comment |
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