Brief Description
भा.प्र.म.२४/५५
भा.प्र.म.२४/५५
किराततिक्तकाकट्वी कुटजस्य फलं वचा । ब्राह्मी फलं च पालाशं सर्जिका कृष्ण जीरकम् ॥
पिप्पली पिप्पलीमूलं चित्रं नागरमूशणम् ।ऎषां कल्कैः मुहुर्घर्षज्जिह्विकामार्द्रका रसैः ॥
तेन सम्यग्विजानाति रसना सकलान् रसान् ॥ कल्कः किराततिक्तादिजिह्वयाः शून्यता हरेत् ॥
चिरायता, कटुकी, इन्द्रजौ, वच, ब्राह्मी, पलाशके फल, सर्जक्षार, काला जीरा, पीपल, पीपला
मूल, चीतामूल, सोंठ और काली मिर्च समान भाग - लेकर चूर्ण बनावें। इसे अद्रकके रसमें पीसकर
बार बार जिह्वा पर मलनेसे जिह्वाकी शून्यता नष्ट होकर समस्त रसोंका ज्ञान होने लगता है।
| Sl.No | Raw Material | Variant | Ratio | Quantity Required for 1000g | Unit |
|---|
| Rasa | |
|---|---|
| Guna | |
| Veerya | Ushna veerya |
| Vipaka | Madhura |
| Prabhava | |
| Anupanam | modal-content |
| Sl.No. | Disease Factor | Name of the combination | Form of the combination | Reference | Combination products | Procedure |
|---|
| Disease Factors |
|---|
| Type | Operator | Value | Unit | Frequency | Duration | Comment |
|---|