Brief Description
Famous carrier medicine which potentiates medicinal qualities of associated medicines.
रसतरङ्गिणी - षष्ठस्तरङ्गः
अथ गलस्थ रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः - 1
तोलकाष्टकमितं रसेश्वरं तन्मितञ्च विमलं बलिं हरेत् । खल्वके खलु विमर्द्य कज्जलीं भावयेदथ वटाङ्कुराम्बुभिः ॥१६२।।
मषीपात्रसमाकारां सुकृष्णां काचकूपिकाम् । सतूलकुट्रितमृदा लेपयेत् खलु यत्नतः ॥१६३॥
स्थापयेत्कज्जलीं काचकुप्यां ततो यत्नतः पाचयेद्वालुकायन्त्रगाम् ।
अग्निवृद्धि क्रमैर्जीर्णागन्धे रसे रोधयेद्यक्तितः काचकूपी मुखम् ।। १६४।।
वालुकायन्त्रके काचकूपीमुखात् रोचनासन्निभो नैति धूमो यदा ।
सूतपाकक्रियाज्ञानदक्षैः बुधै वैदितव्यस्तदा जीर्णगन्धो रसः ॥१६५॥
निवेश्य कुप्याँ खटिकाविधानं जलेन सम्पेषितया प्रकामम् । प्रलेपयेद्वै गुड चूर्णपिष्ट्या ततः पचेद्यामयुगं रसज्ञः ॥१६६॥
अवबुध्य तदंगशीततां खलु बालारुणसूर्यसन्निभम् । गलदेशविलग्नमुज्ज्वलं रससिन्दूर मिहाहरेद् बुध: ।। १६७॥
अथ रससिन्दूर निर्माणप्रकारः- रसः ८ तोलकः, गन्धकः ८ तोलकः, कज्जलीकृत्य वटांकुरजलैर्भावयेत् | रोचनासन्निभः पीतवर्ण इत्यर्थः | अयञ्च बहिर्धूम जारणप्रकारः, अन्तर्धूम निर्माणप्रकारोपयोगि वालुकायन्त्रन्तु पूर्वमेवोचाम, तेन
रससिन्दूरस्य तलस्थतापि भवति ॥ १६२-१६७ ॥
आठ तोला शुद्ध पारद ओर इतना ही शुद्धगन्धक लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में डालकर अच्छी तरह कज्जली बना लें ओर इस कज्जली को वट के अङ्कुरों के जल से एक भावना देकर सुखा ले | अब एक दवात की तरह बनी हुई काले काँच की शीशी लेकर इसको रुई आर मुलतानी मिट्टी को एकत्र कूटकर इससे अलग अलग साफ कपड़मिट्टि करके सुखा लें |
अब पूर्वोक्त कज्जली को इस काँच की शीशी में भरकर इसे वालुकायन्त्र में रखें और मन्द, मध्य तथा तीव्र क्रम से अग्नि देते हुए गन्धक के जल जाने पर शीशी के मुख में सावधानी से डाट लगा दें । वालुकायन्त्र में रखी हुई
शीशी के मुख से जब रोचन सदृश वर्ण अर्थात् पीतरक्त मिश्रित वर्ण का धुआँ निकलना बन्द हो जाय तो गन्धक जीर्ण हो गया हे ऐसा समझकर उसी समय शीशी के मुख में डाट लगाना चाहिये | शीशी के मुख में खटिया या
इंट का बना हुआ डाट लगाकर उसको गुड़ तथा चूने के जल से पीसकर लेप
करके फिर ६ घंटे की अग्नि देवें । जब अग्नि बन्द करने पर वालुकायन्त्र स्वतः शीत हो जाय तो शीशी को निकाल खोलकर उसके गले में लगा हुआ प्रातः काल के सूर्य के समान रक्तवर्ण का रससिन्दूर निकालेँ ।
अथ गलस्थ रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः - 2
वसुतोलक प्रमाणं विमली कृतं रसेशम् । विनिधाय खल्वमध्ये रससंमितञ्च गन्धम् ॥१६॥
दिवस द्वयं प्रयत्नादिह पेषयेद्विधिज्ञः । नवनीलनीरदाभां खलु कज्जलीं बिदध्यात् ।।१६९।।
अथ भावयेद्विधानात्तु वटाङ्कुरोत्थवारा । लघुशाल्मली शिफोत्थैः सलिलैस्तु वा त्रिवारम् ।।१७०।
मसिपात्रकोपमाङ्गीं मलिनां तु काचकूपीम् । जलतूलमृत्तिकाभिः परिलेपयेन्निकामम् ।१७१।।
विनिधाय तां तु कूप्यामथ वालुकाख्ययन्त्रे । क्रम वृद्ध वह्नियोगाद्विपचेद्रसं रसज्ञः ।।१७२।।
मृदु वह्निना च पूर्वं विबुधो द्वियाममात्रम् । विधिना विधानविज्ञः खलु जारयेत्तु गन्धम् ॥१७३॥
अवलोक्य जीर्णगन्धं रसपाकविद्रसेशम् । पिदधीत काचकूपी वदनं पिधानकेन॥ १७४ ॥
गुडचूर्णवारिपिष्ट्या सुविधाय वक्त्ररोधम् । अथ तीत्रवह्नियोगाद्विपचेद् द्वियाममात्रम् ॥ १७५।
स्वत एव शीतलाङ्गीं तु विभिद्य काचकूपीम् ।अरुणोत्पलप्रकाशं रसमाहरेद्रसज्ञः ॥१७६॥
प्रकारान्तरेण रससिन्दूरनिर्माणं शिष्यमतिवैशद्यार्थम् | मलिनामिति कृष्णां नतु मलयुताम् । विधानविज्ञ: पीतधूमाद्यालोकन निपुणः इत्यर्थः ॥१६८-१७६॥
खरल में आठ तोले शुद्ध पारद तथा आठ तोले शुद्ध गन्धक डालकर इन दोनों को एकत्र दो दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके कज्जली बना लें । अब इस कज्जली को वट के अंकुर स्वरस से अथवा कोमल छोटी छोटी सेमल की मूल के स्वरस से तीन भावना देकर सुखा लें | अब एक दवात के सदृश आकार को शीशी लेकर उसको रुई ओर मिट्टी के गारे
से सात कपड़मिट्टी पृथक् करके सुखा लें | इस शीशी में उक्त कज्जली को भर कर वालुकायन्त्र में रखकर इसके नीचे मन्द, मध्य और तीव्र क्रम से अग्नि जलावें परन्तु पहले पहल ३ घंटे तक मन्द मन्द अग्नि देकर फिर मध्यम अग्नि
देवें । जब ६ घंटे में गन्धक जीर्ण हो जाय तो काचकूपी के मुख के ऊपर डाट लगाकर उसको गुड़ और चूने के कल्क से अच्छी तरह बन्द कर दें । और फिर ६ घंटे तक उसको तीव्र अग्नि देकर रससिन्दूर का पाक करें । बालुकायन्त्र
के स्वतः शीत हो जाने पर शीशी को निकालकर उसमें से लाल कमल सदृश वर्ण का शीशी के गले में लगा हुआ रससिन्दूर निकालें ॥ १६८-१७६ ॥
अथ तलस्थ रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः
रसगन्धौ समो कृत्वा तयोः कुर्याच्च कज्जलीम् । तां क्षिपेत्काच कूप्यन्तर्मुखे मुद्रां च दापयेत् ॥१७३॥
विस्तारे च तथायामे निम्नतायां भिषग्वरः । हस्तैकप्रमितं गर्तं कृत्वा कूपीं तु विन्यसेत् ॥ १७८
चतुरडुःलमुत्सेधे वालुकाभिः प्रपूरयेत् । स्याच्च शिष्टः कूपिकायाः कायस्तद्वदनावृतः ॥१७८॥
वन्योपलेस्तु तद्गर्तं पूरयित्वा पुटेत्खलु । स्वाङ्गशीतां कूपिकाञ्च तस्मादपहरेद् भिषक् ||१८०॥
तलस्थं रससिन्दूरं शोणवर्णं प्रजायते । नाम्नाधःसेकतं यन्त्रं खल्वेतत्परिकीर्तितम् ॥१८१॥
नरेन्द्रनाथमित्राख्यैरयं पन्था निदर्शितः। | अनुभूतश्च सुगमः प्रकारः सम्प्रकीर्तितः ॥१८२॥
अनावृत इति बालुकाभिः | दृष्ट कर्मणा वैद्येनायं विधिः सम्पाद्यः । चतुरङ्गुलमित्युपलक्षणम् , तेन कज्जलीपूर्णभागा यावद्वालुका देया । स्पष्टमन्यत्
पारद और गन्ध्रक को समभाग में लेकर कज्जली बना लें और इसको काँच की शीशी में भरकर उसके मुँह में डाट लगा दें और अच्छी तरह बन्द करदे | अब जमीन में एक हाथ लम्बा चोड़ा गड्डा बनाए और इस
बीच में शीशी को रखकर उसके चारों तरफ ४ अंगुल ऊँचे तक बालू भर दें | अब शीशी के बचे हुए भाग को ऊपर गढ़े में जङ्गली गोहरी भरकर जलाकर पुट दें । स्वतः शीत होने पर गले में चिपका हुआ रक्त वर्ण का रससिन्दूर
निकाल ले | तलस्थ रससिन्दूर निर्माण के लिए काम में आनेवाले इस यन्त्र को अधःसैकत यन्त्र कहते हैं | यह विधि वैद्यवर नरेन्द्रनाथ मित्र की बतायी है ओर सुगम हे || १७७-१८२ ||
अर्ध गन्धकजीर्ण रससिन्दूरम्
तोलकाष्टकमितो रसेश्वरः कर्षेकद्वय मितश्च गन्धकः । नव्यसार इह कर्ष संमितः पेषयेदथ च लुङ्गवारिभिः ॥१८३॥
कूपिकागतमथ प्रबुद्ध धीः सम्पचेत् सिकतयन्त्रके भिषक् । शास्त्रवित्खलु विभिद्य कूपिकां हिङ्गुलाभमिह सूतमाहरेत् ॥१८७
अर्धगन्धकजीर्ण रससिन्दूरम् - नव्यसारः नवसादरः । शास्त्र वित् पूर्वोक्त पाकक्रमज्ञाता || १८३-१८४ || |
आठ तोला शुद्ध पारद और दो कर्ष - चार तोला - शुद्ध गंधक और दो तोला नोसादर, इन तीनों को एकत्र मिलाकर बिजोरा नींबूकेरससे खूब अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें और फिर कपड़मिट्टी की हुई कूपी में भर कर बालुकायन्त्र में रखकरके क्रमवृद्ध अग्नि देकर पाक कर लें | यन्त्र के स्वांगशीत होने पर शीशी को तोड़कर उसके गले में लगे हुए सिंगरफ के सदृश
रससिन्दूर को निकालकर शीशी में रख लें || १८३-१८४ ||
इस अर्ध गन्धक रससिन्दूर में गन्धक आधा भाग होने से गन्धक जीर्ण करने में समभागिक रससिन्दूर को अपेक्षा आधा समय लग सकता है | यह सब अग्नि देने पर निर्भर समझना चाहिये |
समानगन्धक जीर्ण रससिन्दूरम्
पामारिं खलु निर्मलं पलमितं तत्तुल्यभागं रसं उत्पादप्रमितं नृसारममलं दत्वाथ सम्पेषयेत् ।
कूपीमध्यगतं विधाय सिकता यन्त्रे पचेद्युक्तितः राजीवोपममूर्ध्वगग रसं कूपीं विभिद्याहरेत् ॥१८५॥
शुद्ध पारद आठ तोला और शुद्ध गन्धक आठ तोला तथा दो तोला शुद्ध नौसादर, इनको एकत्र खरल में मर्दनकर नींबूस्वरस की भावना देकर सुखा लें । बाद को कूपी में भरकर इसे बालुकायन्त्र में रख युक्तिपूर्वक अग्नि देते हुए पकायें । पूर्ण अग्नि देने के बाद यन्त्र के स्वांग शीत होने पर कूपी तोड़कर उसके गल प्रदेश में लगे हुए रक्त वर्ण के रससिन्दूर को सावधानी से निकालें ॥ १८५ ॥
द्विगुणगन्धकजीर्ण रससिन्दूरम्
पामारिं विमलं पलद्वयमितं सूतं पलैकोन्मितं सम्मर्द्याथ विभावयेद्धि कुसुमै रक्ताभकार्पासजै: ।
कूपीमध्यगतं पचेच्च सिकतायन्त्रे त्वहोरात्रकम् राजीवोपम मूर्ध्वभागनिचितं सिन्दूरकञ्चाहरेत् ॥ १८६ ॥
पामारिः गन्धकः । राजीवं रक्तकमलम् || १८६ ॥
शुद्ध गन्धक सोलह तोला, शुद्ध पारद एक पल - आठ तोला -
लेकर दोनों को एकत्र खरल में लाल कपास के फूलों के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन कर कज्जली को सुखाकर कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भर लें और बालुकायन्त्र में रखकर क्रमवृद्ध अग्नि से २४ घंटे तक पकायें । स्वांगशीत होने पर शीशी के गले प्रदेश में लगे डुए रक्त कमल वर्ण के रससिन्दूर को निकालकर शीशी में रख लें || १८६ ॥
त्रिगुणादिगन्धकजीर्णस्य रससिन्दूरस्य विधानम्
अनेनैव विधानेन गन्धकं वर्धयन् क्रमात् । रसकर्म विशेषज्ञो रससिन्दूरमुद्धरेत् ॥ १८७ ॥।
जीर्णगन्धे रसे जाते क्रमागतदिनक्रमैः | यामद्वयं ततः प्राज्ञैः रसपाको विधीयते ॥ १८८ ||
क्रमागतदिनक्रमैरिति यावन्ति दिनानि गन्धको जीर्णः स्यात् तावन्ति दिनानि तस्य जारणेत्यर्थः । गन्धकजारणोत्तरं कूपीमुखमुद्रां विधाय यामद्वयमेव तीव्राग्निदानेन रसपाकः || १८७-१८८ ॥
पूर्वोक्त क्रम के अनुसार ही आठ तोला शुद्ध पारद तथा २४ तोले शुद्ध गन्धक लेकर उक्त विधि से कज्जली करके बालुकायन्त्र में रखकर जितने दिन में मृदु, मध्य तथा तीव्र अग्नि देते हुए पाक हो सके उतने दिन रससिन्दूर बनाना हो उसे गन्धक जीर्ण होने पर डाट लगाकर बन्द करने के बाद छः घंटे की तीव्र अग्नि अवश्य देनी चाहिये || १८७-१८८ ||
अथ षड्गुणगन्धकजीर्ण रससिन्दूरम्
पामारिविमलोङ्गसङ्ख्यकपलः सूतस्य चैकं पलं सम्पेष्याथ विभावयेद् बुधवरो यामं कुमारीरसैः ।
कूपीमध्यगतं विधाय सिकतायन्त्रे ततः सम्पचेत् गाढं वासरसप्तकञ्च विधिना सिन्दूरकं चाहरेत् ॥ १८९॥।
अङ्गसंख्यकपल इति गन्धस्य षट्पलानि | षड्गुणगन्धस्य सप्तभिर्दिनैः पाकः ॥ १८६ ॥
शुद्ध गन्धक छः पल - ४८ तोला - और शुद्ध पारद एक पल - आठ तोला - लेकर इसकी कज्जली करके इसको कुमारीस्वरस से तीन घंटेतक अच्छी तरह मर्दन कर सुखा लें ओर कपड़मिट्टी की हुई काँच की दृढ़ बोतल में भरकर इसे वालुकायन्त्र में रखकर क्रमवृद्धि रूप से सात दिन अग्नि देते हुए पाक कर लें | अर्थात् गन्धक जीर्ण होने पर डाट देकर फिर उसे दोषहर को अग्नि देकर स्वांगशीतल करके शीशी में से सुन्दर रससिन्दूर को निकालकर रख लें | १८६ ||
रससिन्दूरस्य गुणाः
प्रमेह करिकेशरी प्रबलशूलकालानलो भगन्दरहरः परं खलु महाज्वरेभांकुशः ।
समस्तगदतस्करः सकलशोषसंशोषको रसोतुलविलासदो विजयते हि सिन्दूरकः ॥ १९० ॥
अलं मलयजानिलैः किमिह भेषजानां कुलैः वृथैव घनशीतलैः सरसचन्दनालेपनेः ।
सखे मदनजीवनं रतिविलासलीलागृहं प्रकामबलकान्तिदं भज रसं ससिन्दूरकम् ॥ १९१ ॥
गुल्मप्लीहहराः रतिप्रियकरो यक्ष्मेभपंचाननः पाण्डुस्यौल्यविधूननो व्रणहरो रौक्ष्याग्निमान्द्यापहः ।
कुष्ठव्याधिनिषूदनो रतिकलाप्रौढाङ्गनारञ्जनः कान्तामस्तकभूषणो रसपतिभूयात्सदा श्रेयसे ॥१९२॥
नियमयति रसेशपंचवाता नितान्तं प्रसरति धमनीनां स्वक्रिया वातसाम्ये ।
दृढयति भृशमादौ जालकं नाडिकानां रमयति च ततोसौ मानसं सेवकानाम् ॥ १९३ ॥
बहिर्गमनशीला ये स्वेदविण्मूत्रमारुताः । निरायासं विनिर्यान्ति रसस्यास्य निषेवणात् ॥ १९४ ॥
पित्तं निःसारयत्येष न रेचयति कर्हिचित्।| न च पित्ताशयं कोष्ठं विक्षोभयति भक्षितः। १९५॥
स्फीततां दन्तवेष्टानां मुखपाकं क्षतादिकम् । लालास्रावं प्रदाहं च न सूते चिरसेवितः ॥ १९६ ॥
विकारानीदृशानन्यान् दारुणान् पारदोत्थितान् । न जातु प्रकरोत्येष रसः सिन्दूरसंज्ञकः ॥ १९७ ॥
दोषत्रितयमत्यर्थ प्रवृद्धं शमयत्यलम् । प्रकृतिं गमयत्यत्र करणानि विशेषतः ।। ९९८ ॥
अथास्य गुणाः - महाज्वरेभाङ्कुश इति महाज्वर एव हस्ती तस्मै अङ्कुश इव । अलं मलयजानिलैरित्यनेनास्य कामोद्दीपकत्वं सूच्यते । कान्तामस्तक भूषणः सिन्दूरम् । नियमयतीति रससिन्दूरं साधुसेवितं नितान्तं शारीरान्
पञ्चवातानुद्रिक्तान् नियमयति प्रकृतावानयति । ततश्च वातसाम्ये सति धमनीनां स्वक्रिया रुधिरधमनरूपा जायमाना प्रसरति । अपि चायमादौ संज्ञावहानां चेष्टा वहानाञ्च नाडिकानां जालक तत्तत्कर्मक्षमतासम्पादनद्वारा दृढयति । ततोसौ
स्वसेवकानां मानसं रमयति इति शारीरप्रक्रियापादनद्वारा साधीयसी कर्मण्यता भवत्यनेनेत्याशयः | तथा चायं स्वाशयादधिकं पित्तं निःसारयति न च रेचयति, पित्ताशयं कोष्ठञ्चामपक्वाशयरूपं न विक्षोभयति । तथा रसकर्पूरादिवत् दन्त वेष्टानां स्फीततां शोथं मुखपाकं तालुक्षतादिकं लालास्रावं प्रदाहञ्च चिरसेवितोपि न जनयति | अन्यानपि पारदोत्थितान् दारुणान् भ्रममोहादीन् विकारान् रससिन्दूरो न करोतीति सर्वथा निरापदमस्य सेवनमित्याशयः । रोगापनयनावशिष्टोस्याप्यंशोधिकः. स्वेदादि द्वारा स्वतः शारीराद् बहिर्विनिर्यातीति नायं रसकर्पूरवत् पारदनिःसारकोप्रधान्तरापेक्ष इति प्राचामभिप्रायः | स चायं रस सिन्दूरः स्वप्रमाणातिरिक्तदोषत्रयं शमयति | तथा सर्वाणीन्द्रियाणि स्वां स्वां प्रकृतिं स्वस्वविभ्रयाणां यथावद्ग्रहणरूपां गमयति इति || १६०-१६८ ॥
उक्त विधि से वना हुआ रससिन्दूर प्रमेह रूपी हाथी के लिये सिंह समान नाशक है । प्रबल शूल को समूल नष्ट करता है | इसके कुछ दिन प्रयोग से भगंदर नष्ट हो जाता है ओर यह महाज्वर रूपी हाथी के लिये अंकुश का काम करता है । यह रससिन्दूर शरीर के सब रोगों को नष्ट कर देता है । सब प्रकार के शोष - क्षय - को सुखानेवाला है । स्वस्थ शरीर में अत्यन्त
अनन्द का अनुभव करता है । शरीर में कामोद्दीपन करनेवाली अनेक प्रकार की कामोद्दीपक औषधियाँ, तथा विहार आदि यह सब रससिन्दूर के सामने व्यर्थ समझने चाहिये । यह रससिन्दूर गुल्मरोगहर तथा रमणेच्छा प्रवर्तक है । राजयक्ष्मा रूपी हाथी के लिये सिंह के समान घातक है । पाण्डुरोग, स्थूलता को दूर करता है । व्रण,शरीर को रूक्षता तथा अग्निमान्द्य को दूर करता है | कुष्ठ रोंगों को नष्ट करता तथा रतिकला में चतुर स्त्री को प्रसन्नता देनेवाला है । रससिंदूर प्राणादि भेद से पाँच प्रकार के वायुओं का नियमन करता है जिससे वायु समभाव में होकर धमनियों की अपनी क्रिया - रक्तप्रसरण क्रिया ठीक होती है । इसके सेवन से वातनाड़ियों का कालसमुदाय दृढ़ ( स्वकार्यक्षम ) होता है । इसी कारण रससिन्दूर सेवन करने वालों का मन सदा प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है । रससिन्दूर के नियमपर्वक योग्य अनुपात के साथ सेवन करने से मल रूप में शरीर से बाहर निकलने वाले मल मूत्र तथा अपानवायु बिना कष्ट के वाहर निकलते रहते हैं और शरीर शुद्ध रहता है । यह पित्त को बाहर निकालता है, परन्तु दस्त - पतला - नहीं लाता है और पित्ताशय अथवा कोष्ठ में किसी प्रकार का क्षोभ नहीं पैदा करता हे। इसके अतिरिक्त चिरकाल तक सेवन करने पर भी केवल पारद अथवा निर्गन्ध पारद योगों के समान,
दाँतों के मसूड़ों में शोथ, मुखपाक, व्रण, लालास्राव तथा प्रदाहविकार उत्पन्न नहीं करता है, इस प्रकार अन्यान्य केवल पारद योग भक्षण से होनेवाले कोई भी विकार रससिन्दूर के सेवन से नहीं होते हैं । इसके विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर, में अत्यन्त बढ़े हुए वांतादि दोष शान्त हो जाते हैं और सब इन्द्रियों का अपेने विषय ग्रहण रूपी व्यापार भी यथावत् होता रहता है ॥॥ १६०-१६८ ||
| Sl.No | Raw Material | Variant | Ratio | Quantity Required for 1000g | Unit |
|---|
| Rasa | |
|---|---|
| Guna | |
| Veerya | |
| Vipaka | |
| Prabhava | |
| Anupanam | modal-content |
| Sl.No. | Disease Factor | Name of the combination | Form of the combination | Reference | Combination products | Procedure |
|---|
| Disease Factors |
|---|
| Type | Operator | Value | Unit | Frequency | Duration | Comment | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| Adult Dosage | कूपिपक्व रसायनम् - Kupipakva Rasayanam | <= | 125 | mg | 1 times / day | 365 days | |
| Child Dosage | कूपिपक्व रसायनम् - Kupipakva Rasayanam | <= | 62.5 | mg | 1 times / day | 365 days |